वैज्ञानिक क्रांति कब शुरू हुई और कैसे शुरू हुई?

वैज्ञानिक क्रांति एक ऐसी क्रांति है जो धार्मिक वाद को खुली चुनौती देकर इनके जो भी विश्वास नियम आस्था इन सभी को हिला दिया था। 
इस वैज्ञानिक युग में कई तरह के असमंजस को समझाने के लिए खोज हुई है जिसके कारण धार्मिक गुरु वैज्ञानिक सिद्धांत के खिलाफ हो गए थे। 


दोस्तों आज आप वैज्ञानिक क्रांति के बारे में जानने के लिए इंटरनेट में जानकारी खोज रहे हैं होंगे तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं मैं आपको वैज्ञानिक क्रांति कब शुरू हुई थी।

और किस तरह से शुरू हुई थी इन सभी के बारे में आपको जानकारी दूंगा आप इस आर्टिकल को बिना एक भी पॉइंट का छोड़ें शुरू से लेकर अंत तक पढ़ते रहिए।

वैज्ञानिक क्रांति क्या है? इस से आप क्या समझते हैं?


मध्यकालीन यूरोप में इस्लाम फैला हुआ था और भारत में ईश्वरवाद को मानता था। उस समय जो ईश्वर इस्लाम धर्म के लोग अपने धार्मिक नियम के अनुसार लोगों को शिक्षा दे रहे थे।
उस समय वैज्ञानिक क्रांति नहीं हुआ।

था तो लोगों का मानना था कि इस पूरी सृष्टि को ईश्वर ने ही बनाई है और ईश्वर ही इसे मिटा सकता है।

उस समय लोगों का मानना था कि यदि हमको स्वर्ग में जाना है तो हमको सिर्फ ईश्वर को ही पूजा पाठ साधना भक्ति करना है और भगवान के भक्ति में ही लीन हो जाना है तभी हमें इस दुनिया से मोक्ष प्राप्त होगी।

उस समय जो भी व्यक्ति हैं ईश्वर कि जो भी कहीं भी बातों को लगाने की कोशिश करते थे तो उन्हें लोग गलत ठहराने की कोशिश करते थे और उन्हें भगवान या इस्लाम की खिलाफ मानते थे।

यही कारण है कि मध्यकालीन में भौतिक विज्ञान को उतना अच्छे से अध्ययन नहीं किया और उनका विकास अच्छे से नहीं हो पाया।

लेकिन फिर भी वैज्ञानिकों ने अपना काम को बंद नहीं किया खासकर मध्यकाल में इस्लामी देशों में वैज्ञानिकों ने अपनी खोज को लगातार चलाते रहे।

इसी समय भारत में जो भी वैज्ञानिक तकनीकी और गणितीय साहित्य हुआ करता था इन्हें अरब की कुछ दार्शनिकों ने अनुवाद करके अपने देश में ले गया और वहां अध्ययन कराया गया।

खास करके भारत के संख्या पद्धति जो की बहुत ही गणित के क्षेत्र में प्रसिद्ध है इसे अपने देश की ओर ले गया। इसी समय चीन में कई तरह के अविष्कार हुए।

जैसे कि बारूद जिससे विस्फोट कर सकते हैं छापाखाना जिसके माध्यम से आज हम लोग पेपर के माध्यम से प्रिंट करते हैं और वहां पर चुंबक को खोज निकाला था।

वैज्ञानिक क्रांति में ही अरब के वैज्ञानिकों ने चाइना के और भारत के खगोल शास्त्रियों द्वारा की गई ब्रह्मांड के तारा ग्रह उपग्रह कैसे चलते हैं उनकी प्रकृति को कैसे समझते हैं? इन सब को आगे बढ़ाया।

इस तरह से अरब के लोगों ने भारत और चाइना के साइंस को यूरोप में पहुंचाने के लिए बहुत ही बड़ी भूमिका निभाई थी।

इसी तरह से और बहुत सारे वैज्ञानिक खोज हुए हैं और सभी लोग वैज्ञानिक तरीके से तर्क लगाना और सोचना और परीक्षण करना यह सभी चीजें शुरुआत हुई चलिए से और विस्तार से एक-एक करके कुछ और जानकारी है उसे जानते हैं।

1.रोजर बेकन का प्रयोग के आधार पर निष्कर्ष निकालने का जोर देना

उस समय बहुत सारे वैज्ञानिक थे उसी में से एक वैज्ञानिक रोजर बेकन है हर चीज को प्रयोग करके ही निष्कर्ष निकालने पर बहुत ही जोर दिया था क्योंकि प्रयोग के आधार पर जो भी निष्कर्ष निकलते थे वह एक बहुत ही ज्यादा सटीक होता था।

उस समय अधिकतर जो भी दार्शनिक और विद्वान हुआ करता था वह सभी अपने किसी भी प्रश्न का उत्तर अपने सालों के अनुभव और कुछ खास करके उत्तर दिया करता था।

लेकिन जब रोजर बेकन का प्रयोग के आधार पर निष्कर्ष निकालने के तरीका को सभी लोग जाने लगे तो इन्हें और आगे बढ़ाने में सहमति जताई।

2.निकोलस कॉपरनिकस तारे सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया है।


उस समय ब्रह्मांड के अन्य प्रश्नों को लेकर काफी विवाद हुआ करता था उस समय मध्यकालीन के विद्वानों का मानना यह था कि पृथ्वी ब्रह्मांड के एक केंद्र में है और सभी तारे, सूर्य, ग्रह और चंद्रमा पृथ्वी के चक्कर लगा रहे हैं।

क्योंकि यह धारणा प्राचीन काल के यूनानी दार्शनिक अरस्तु के द्वारा दिया गया था उस समय लोग पृथ्वी को सपाट मानते थे क्योंकि किसी को भी धरती गोल दिखाई नहीं दे रहा था और सभी लोग कहते थे कि पृथ्वी शक्ति है और यह स्थित है।

लेकिन उस समय मध्यकालीन मे वैज्ञानिक क्रांतिकारी शुरू हो रहा था तो कई वैज्ञानिकों ने इस अवधारणा को जांचने के लिए कि सच में पृथ्वी के चारों तरफ सौरमंडल जिसमें सूर्या ग्रह और तारे हैं।

इसे परखने के लिए पोलैंड देश के एक वैज्ञानिक निकोलस कॉपरनिकस जिनका जन्म सन 1973 और उसका मृत्यु सन 1593 में हुआ था। निकोलास कॉपरनिकस ने गहन अध्ययन किया और उसने अपने एक पुस्तक में बताया।

कि हम ऐसे बहुत सारे ब्रह्मांड से संबंधित समस्याओं को सुलझा सकते हैं यदि हम पृथ्वी को केंद्र ना मानकर सूर्य को केंद्र मानते हैं और जिसमें सूर्य के चारों ओर सारे ग्रह परिक्रमा लगा रहे हैं।

कॉपरनिकस के जैसे ही उसकी पुस्तक बाजार में प्रकाशित हुआ लोगों ने जाने लगा की पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में ना होकर पृथ्वी के चक्कर लगा रहे हैं।

तो बहुत से लोग माननीय से इंकार कर रहे थे और चर्च के अनुसार भगवान हमें पृथ्वी में रहने के लिए पृथ्वी को केंद्र में रखा है इस कारण से चर्च भी इसका विरोध भी कर रहे थे।

3.डेनमार्क में वेधशाला स्थापित किया था


निकोलस कॉपरनिकस का पुस्तक में कही गई बातें की पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में ना होकर सूर्य के चक्कर लगा रही है इसे कई लोग मानने से कार्य कर रहे थे।

बहुत से लोग इसका विरोध किया और इन चारों को जांचने के लिए आसमान में आसमान में तारों व ग्रहों की चाल को जानने के लिए बारीकी से अध्ययन करना शुरू कर दिया।

इसी में से एक टायको ब्राहे ने डेनमार्क एक देश है जिसमें एक वेधशाला स्थापित कर दिया ताकि वहां जाकर वैज्ञानिक तरीके से अवलोकन करके ग्रहों की चाल की गणना की जा सके।

4.मध्यकालीन युग में केप्लर ने भी अध्ययन किया था।


इन गणना को और अच्छे से परखने के लिए एक केप्लर नामक खगोलशास्त्री जिसका जन्म सन 1571 में हुआ था और इसका मृत्यु सन 1630 में हो गया था। केप्लर ने इसे अच्छे से अध्ययन किया और पाया कि सूर्य के आसपास पृथ्वी के साथ-साथ अन्य ग्रह भी परिक्रमा कर रहा है जैसे कि कॉपरनिकस ने भी वैसे ही कहा था लेकिन कॉपरनिकस का मानना था कि ग्रह एक गोलाकार पथ में चलकर परिक्रमा करते हैं जबकि केप्लर की गणना के अनुसार ग्रह गोलाकार पथ में ना करके बल्कि अंडाकार पथ में घूमते हैं।

5.गैलीलियो ने दूर तक देखने के लिए दूरबीन खोजा

केप्लर ने इस बात की पुष्टि किया कि इस भौतिक जगत है इसे हम सिर्फ ईश्वरवाद के विश्वासों धर्म ग्रंथ और अन्य मान्यताओं के आधार पर कभी नहीं समझ सकते बल्कि यह हमारे साथ विश्वासघात होगा।

इसी को आगे बढ़ाते हुए हैं इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो इसका जन्म सन 1564 और इसका मृत्यु सन 1640 में हुआ था जिसने यह विशेषता दिया था कि इस ब्रह्मांड से कई तरह के सवाल पूछे और उनके उत्तर जानने के लिए कठिन अध्ययन किया।

और अपने आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि बारीक मापन और गणना को बहुत अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। यही आधुनिक विज्ञान के मूल सिद्धांत बन गया।

गलियों ने जो समुद्र में समुद्र जहाज चलाते हैं उन नागरिकों के लिए टेलिस्कोप का उपयोग करने के लिए नए आविष्कार किया इसी को गलियों ने बाद में उपयोग करके अंतरिक्ष में ग्रहों को देखना शुरू किया जिसमें उसने पाया।

कि बृहस्पति ग्रह और शनि ग्रह जैसे ग्रहों के चारों और कई सारे चंद्रमा परिक्रमा लगाते हैं उसने सोचा कि ग्रहों के चारों ओर उग्र क्यों परिक्रमा कर रहा है और उसे कौन जितना बल देता है या समझने के लिए चीजें क्यों चलती है और क्यों रूकती है।

इसके लिए उसने बहुत तरह-तरह के प्रयोग की है जैसे की भारी और हल्की वस्तु को ऊपर से नीचे गिराने पर उसने देखा कि कोई फर्क है? या नहीं क्या यह गिरती है? तो कौन जल्दी और कौन धीमी गति से गिरती है?

किसी चीज को धागे पर लटका कर हिला कर देखना और गेंदों को लुडकाकर कर देखना कि किस कोण से और कैसे फर्श पर वह सबसे अधिक लुड़कती है इन सब के आधार पर गैलीलियो ने कॉपरनिकस के सूर्य केंद्रीय सिद्धांत को देखा तो सही पाया और उसने इस बात को एक पुस्तक में लिखकर प्रकाशित किया।

गलियों ने जैसे ही पृथ्वी की जगह सूर्य को ब्रह्मांड के केंद्र में रखकर पुस्तक प्रकाशित किया तो गलियों की इस पुस्तक को जो भी लिखा गया जानकारी चर्च के लोगों को पसंद नहीं आया और इस पर बैन लगवा दिया गया।

और चर्च के लीडर ने गलियों को अपने लिखे गए कथनों को और जो भी करना निकाले थे उनको वापस लेने के लिए कहा था गैलीलियो ने हालांकि जहां पर पोक का सत्ता था वहां पर अपना पुस्तक पब्लिश नहीं किया लेकिन गैलीलियो ने अपने खोज को गोपनीय रूप से सभी लोगों से छुपा कर करते रहे।
इस समय धार्मिक लोगों ने वैज्ञानिक खोज को बंद करवाने की बहुत कोशिश की जिससे भौतिक विज्ञान पर काफी असर हुआ यदि ऐसा नहीं होता तो आज और बहुत ज्यादा खोज हो गया होता क्योंकि उस समय के विज्ञानी इस पर बहुत है मेहनत करते थे।

6.आइज़क न्यूटन

कितना और गलियों की खोजों को आगे बढ़ाते हुए इंग्लैंड की एक अंग्रेजी वैज्ञानिक आइज़क न्यूटन का जन्म सन 1642 और मृत्यु स्थान 1727 है इस आइज़क न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण और खगोलीय पिंडों की गति का सिद्धांत दिया।

आइज़क न्यूटन के इस खोज ने पूरे धार्मिक लोगों समझा दिया कि धार्मिक अध्ययन से इस जगत को नहीं समझा जा सकता है।

इस तरह से आइज़क न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण और अन्य खोज ने विज्ञान को एक अलग ऊंचाई पर ले गया इससे यह साबित हो गया। धार्मिक पूर्वाग्रह से मुक्त होना बहुत ही जरूरी है और नए विज्ञान का शुरुआत हुआ जिसमें कि विज्ञान के नियम को मानकर ही हम लोग नए-नए चीज खोज सकते हैं

7.चुंबकीय दिक् सूचक को समुद्री यात्राओं में करने लगा

उस समय यूरोप के समुद्री जहाज चलाने वाले नाविक ने भारत और चीन जाने के लिए नए-नए मार्ग ढूंढ रहे थे दूर तक यात्रा करना बहुत ही कष्ट हुआ करता था क्योंकि अभी देखा जाए तो बहुत ही आसान हो गया है लेकिन उस समय समुद्र में तारों और ग्रहों की स्थिति को गणना करके जो भी अवलोकन प्राप्त होता था उसी से ही उस जगह या उस देश की दिशा को अनुमान लगाकर जाया करता था।

और उसी समय चुंबकीय दिक सूचक का उपयोग बहुत होने लगा क्योंकि इसमें जब आप समुद्र के बीच या आसपास भूल जाते हैं तो अपने दिशा को जाने के लिए आप चुंबकीय दिक् सूचकओं का उपयोग कर सकते हैं उस समय इसका उपयोग उत्तर दक्षिण को जानने के लिए क्या करता था।

8.गोला बारूद का युद्ध में उपयोग हुआ

मध्यकालीन युग में युद्ध लड़ने के लिए बहुत सारे चीजों का उपयोग हुआ उस समय काफी तलवार घोड़ा और अन्य ढालो का उपयोग पहले से हुआ करता था लेकिन जब मध्यकालीन में वैज्ञानिक क्रांतिकारी आया।

तो युद्ध को जीतने के लिए तोपों का उपयोग होना शुरू हुआ उस समय यह जानना जरूरी था कि तोपो को किस कोण से दागने पर गोला कितनी दूरी जाकर किसको मार देगा इन सब के साथ-साथ गोला की वजन कितना है?

और गोला का व्यास कितना है? इन सब का अध्ययन एक युद्ध को लड़ने के लिए करना बहुत ही जरूरी था। जोकि वैज्ञानिक तरीके के अध्ययन से यह सब कुछ जानना लगभग असंभव था यही कारण है कि वैज्ञानिक क्रांति के कारण ही यह सब कुछ संभव हो पाया।

इस आर्टिकल का सारांश क्या है?

दोस्तों आप समझ गए होंगे कि वैज्ञानिक क्रांति कैसे शुरू हुई थी और क्या-क्या समस्याएं आई थी वैज्ञानिक क्रांति को बढ़ाने में इसके बावजूद वैज्ञानिकों ने किस तरह से अपनी खोज को जारी रखा।

ताकि आने वाले समय में उसके आधार पर वैज्ञानिक खोज हो सके क्योंकि उस समय धार्मिक ईश्वर बाद इस्लामिक क्रिश्चियन इन सभी का पूरी दुनिया पर दबदबा थी।

लेकिन वैज्ञानिक क्रांति आने के बाद ही हमें नए-नए अविष्कारों को देखने कौशल मिला और उसके बाद ही यह दुनिया एक आधुनिक जगत के रूप में आया।

इस तरह से वैज्ञानिक क्रांति हुआ था चलो तो मैं आपको ही शादी कर ली वैज्ञानिक क्रांति कैसे हुआ था इन सबका जानकारी दे दिया था।

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