प्रबोधन की मुख्य विशेषताएं क्या थी इसका वैज्ञानिक क्रांति से क्या संबंध था?

प्रबोधन एक ऐसी विचारधारा थी जो आधुनिक युग में देखने को मिलता है।
यदि 18 वीं सदी में प्रबोधन विचारधारा नहीं आया होता तो आज भी धार्मिक सत्ता और धर्म के नियम ही पूरी दुनिया में लागू हुआ होता।

 

क्योंकि प्रबोधन एक ऐसी विचारधारा है जो हमें हमारे दिमाग पर पूरा जोर देता है।

ताकि हम लोग अपने तर्क और बुद्धि और विज्ञान के माध्यम से कुछ भी निर्णय ले सके और अपने जीवन शैली को सुना सके यही कारण है।
कि प्रबोधन कई क्रांतिकारियों का प्रेरक रही है तो चलिए दोस्तों आज हम लोग प्रबोधन क्या है और प्रबोधन की क्या-क्या विशेषता है
और इनके क्या की सीमाएं हैं उन सभी के बारे में चर्चा करेंगे तो आप इस आर्टिकल को शुरू से लेकर अंत तक पढ़ी है क्योंकि यदि आप एक भी चीज छोड़ देते हो तो आपको कुछ समझ नहीं आएगा।

प्रबोधन से आप क्या समझते हैं?

18 वीं सदी उस समय था जिसमें लोगों को एहसास होने लगा कि हम अपनी जिंदगी को तभी सुधार सकते हैं जब हम विज्ञान तर्क और उद्यम की सहायता से जो कुछ करते हैं वह करना चाहिए।
इसी के माध्यम से हम मनुष्य अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ सकते हैं अन्यथा हम लोग एक बंधन में बंधकर सिमट जाएंगे। लेकिन यह तभी संभव हो सकेगा।
जब इसके ऊपर कोई धर्मगुरु या कोई संगठन इस पर हावी ना हो विज्ञान किसी के सामने ना झुके यानी ऐसी सामाजिक व्यवस्था हो जिसमें किसी का प्रभुत्व जा वर्चस्व ना हो और लोग अपनी ज्ञान बुद्धि तर्क इन सभी के आधार पर निर्णय ले पाए।
इतनी शक्तिशाली विचार थे कि इनकी विचार से अमेरिकी कांस्य सी क्रांतिकारियों ने प्रेरक ली और आज भी आधुनिक युग के लोग इस पर सोचते हैं।
यूरोप में 17 वी – 18 वीं सदी उस समय का वह युग जिसमें बहुत सारे क्रांतिकारियों का परिवर्तन हुआ यही कारण है कि इस काल को प्रबोधन, ज्ञानोदय, अथवा विवेक का युग के नाम से जाना गया और इसका आधार पुनर्जागरण, धर्म सुधार आंदोलन, व वाणिज्य क्रांति ने तैयार किया था।
पुनर्जागरण काल में विकसित हुई वैज्ञानिक चेतना ने तर्क और अन्वेषण की प्रवृत्ति ने 18वीं शताब्दी में परिपक्वता प्राप्त कर ली वैज्ञानिक चिंतन की इस परिपक्व अवस्था को प्रबोधन के नाम से जाना जाता है।
प्रबोधन की विचारों को और आगे ले जाने के लिए फ्रांस के कई विचारों को नहीं इस पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ऐसी नहीं थी कि इसके विचार को धार्मिक लोग विरोध नहीं करेंगे आगे हम जानेंगे की इनके विचार को कैसे बहुत लोग विरोध किए थे।

 

प्रबोधन के मुख्य विचार क्या क्या है?

उनके विचारों को आगे ले जाने के लिए उनमें से कुछ प्रमुख थे जैसे कि वालतेयर और जिसका जन्म 1696 और मृत्यु सन 1778 था और दिदेरा है जिसको जन्म सन 1713 और इसका मृत्यु 1784 था।
इसके अलावा स्कॉटलैंड के दार्शनिक डेविड ह्यूम जिसका जन्म 17 से 11 और इस पर मृत्यु सन 1776 था।
जर्मनी में प्रबोधन के विचार को फैलाने वाले प्रबोधन के प्रमुख दार्शनिक इमानुवेल कांट थे जिसका जन्म 1724 और इसका मृत्यु सन 1804 है।
और इस विचारों को फैलाने का पूरा श्रेय फ्रेंच भाषा में एमजी दिदेरा द्वारा संपादित व संकलित विश्वकोश को जिसमें आज की खोज और विचारों का सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया था

1.विकास की अवधारणा को

उस समय जो भी प्रबोधन की चिंतकों का मानना था दुनिया पहले से अब विकास होते चली जा रही है वर्तमान भूतकाल से कहीं अधिक अच्छा है मनुष्य विज्ञान अपने तर्क उद्यमिता केवल होते आने वाले दिन में और विकास तरक्की कर सकता है।
उनकी तरक्की का तात्पर्य था कि मनुष्य विज्ञान और तकनीकी की मदद से पहले से कहीं अधिक प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है।
इमानुएल कांत का मानना था कि विकास का अर्थ है या नहीं की मनुष्य सुखी खोज होंगे क्योंकि मनुष्य जहां से किसी भी समय में सुख-दुख हो सकता है उनका मानना था।
कि विकास वास्तविक मानदंड है मनुष्य की स्वतंत्रता में वृद्धि और जीवन में कुल प्रचुरता आधुनिक काल उन्नत और बेहतर इसलिए है।
लेकिन कि मनुष्य पहले से अधिक और स्वतंत्रता है और वह अलग-अलग जीवन शैली के बीच विकल्प कर सकता है।

2.तर्क या बुद्धि का युग

प्रबोधन के जो विचारों को का मानना था कि इस समय तर्क चिंतन धीरे-धीरे मनुष्य के निर्णय को धीरे धीरे निर्धारित करता है।
ना की किसी अलौकिक अंधविश्वास पर या धर्म या किसी कुलीन व्यक्ति के कहे द्वारा उनका मानना था कि तर्क और बुद्धि से कोई भी व्यक्ति चोरी से बिना बताए गलत करके गलती करता है।
तो उसे बुद्धि और तर्क से सुलझाया जा सकता है और उन्हें सही रास्ते पर ले जाया जा सकता है
बुद्धि और तर्क एक ऐसा चीज है जो मनुष्य को बुद्धिमान और सही जीवन जीने की रास्ता दिखाता है इसीलिए प्रबोधन का मुख्य मकसद लोगों के जीवन में तर्क को फैलाना था और उसको यह विश्वास दिलाना कि आप तर्क से कुछ भी कर सकते हैं

3.विज्ञान की क्रांति

प्रबोधन के प्रवक्ताओं ने माना कि विज्ञान ही विशिष्ट ज्ञान है और यह हमें सही ज्ञान दिला सकते हैं विज्ञान का अर्थ है।
यह था कि हमें इस निष्कर्ष पर अवलोकन व प्रयोगों के आधार पर तार्किक रूप से ले जाया जा सकता है चीन का स्पष्ट रूप से प्रमाण हो।
किसी अलौकिक देवी शक्ति संदेश या अध्यात्मिक ज्ञान ईश्वर वादी इस्लामिक वादी की प्रमाणिकता स्वीकार नहीं करना चाहिए
विज्ञानिक ऐसी चीज है जिसके बारे में हम लोग धीरे-धीरे करके पूरी दुनिया को हम लोग जान सकते हो और उस पर राज कर सकते हैं।
प्राचीन तथा मध्यकालीन में ज्ञान के संबंध में या जाना जाता था कि वह केवल चीजों का व्यवस्थित वर्गीकरण है प्रबंध के वैज्ञानिकों के अनुसार ज्ञान का दूसरा उद्देश्य सूची बनाना।
नहीं बल्कि चीजों के कारणों को समझना उनके पीछे क्या काम करता है नहीं जाना होता है इसके बाद पूरी दुनिया में कब क्यों कैसे इस तरह के सवाल उठना जायज हो गए।

4.विज्ञान बनाम धर्म

प्रबोधन के विचार को तमन्ना था कि धर्म सिर्फ अंधविश्वास है जो लोगों को झूठे झूठे कहानियां बताकर अलौकिक शक्तियों पर विश्वास दिलाते हैं और उनकी झूठी कहानियों के अनुसार डर के जीने को सिखाते हैं।
इसमें एक धर्म दूसरे धर्म के खिलाफ लड़ाई छेड़ देते हैं जिससे कई लोगों की जान जाती है और उससे खून बातें हैं प्रबोधन चर्चा के एकाधिकार के सख्त खिलाफ थे
धर्म में मूर्ति पूजा और किसी एक चीज को ही आदर्श मानना प्रबोधन के विचार इन सभी के खिलाफ थे लेकिन बहुत से प्रबोधन की चिंता नास्तिक नहीं थे उनमें के पूछो आस्तिक थे।

5.स्वतंत्रता का अधिकार

प्रबोधन के समर्थन करने वाले व्यक्ति से जो प्रबोधन के प्रचारक थे उनका मानना था कि लोगों पर यदि कोई शासन नियम लागू करना है।
तो उनका खुद का समिति होना बहुत ही जरूरी है तभी वह उस नियम को मान सके यदि जबरन उस पर कोई नियम कानून थोप देता है
तो वह अच्छे से स्वतंत्र रूप से नहीं जी सकते हैं।
इस कारण से वे हर तरह की गैर लोकतांत्रिक और व्यवस्थाएं और निरंकुशता के खिलाफ थे।

प्रबोधन की आलोचना

जब प्रबोधन का विचार पूरी दुनिया पर चरम पर थी तो उस समय इंग्लैंड और पूरी यूरोप पर औद्योगिकरण हो रहे थे जिसके कारण प्रकृति का खनन और प्रदूषण और लोगों का शोषण हो रहा था।
दूसरी ओर राजनीतिक कांथियों के कारण पुराने पद्धतियां नष्ट हो रही थी उसी समय अमेरिका ऑस्ट्रेलिया भारत के देशों में जनजाति और भाईचारा का जीवन देखने को मिलता था।
जो लोग औद्योगिकरण आदि से प्रस्तुति आधुनिक युग की निंदा करने लगा उन्हें बार-बार कहते थे कि यह गलत है यह इससे हमारे दुनिया नष्ट हो जाएगी हमें सिर्फ प्रकृति से जोड़कर एक सादगी जीवन जीना चाहिए
वे लोग आधुनिक युग की आलोचना करने लगे और उसके साथ-साथ विज्ञान और बुद्धि बात कभी विरोध होने लगा इनमें रूमानी आंदोलन के दार्शनिक और कवि और अन्य कलाकार प्रमुख थे
जहां प्रबोधन पूरी दुनिया को समझने का प्रयास कर रहा था दूसरी ओर प्रबोधन के खिलाफ खड़े हुए हैं वह लोग भावनाओं और एहसासों को यह समझ रहा था।
रोमानियों ने प्रबोधन के खिलाफ आलोचना करने के लिए भारतीय, चाइना और जापान के संस्कृति को और उनके साहित्य को बहुत ही ज्यादा सराहा और उनके अध्ययन पर ज्यादा जोर दिया।
जैसे कि कालिदास के काव्य को पढ़ने के लिए कहां गया। इस तरह से प्रबोधन के विचारों को बहुत ही तरीकों से आलोचना किया गया।

प्रबोधनयुगीन चिंतन एवं पुनर्जागरण में अंतर

आत्मविश्वास- 

पुनर्जागरण कालीन मध्यवर्ग अभी आत्मविश्वास से युक्त नहीं था अतः वह इस बात पर बल देता था कि अतीत से प्राप्त ज्ञान ही श्रेष्ठ है और बुद्धि की बात करते हुए उदाहरण के रूप में ग्रीक एवं लैटिन साहित्य पर बल देता था।
जबकि प्रबोधन कालीन मध्य वर्ग में शक्ति और आत्मविश्वास आ चुका था इस कारण उसने राजतंत्र की निरंकुशता एवं चर्च के आडंबर के खिलाफ आवाज उठाई और तर्क के माध्यम से अपनी बात की

ज्ञान का आधार

पुनर्जागरण का बल ज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक था जबकि प्रबोधन चिंतन का मानना था कि ज्ञान वही है जिसका परीक्षण किया जा सके।
और जो व्यावहारिक जीवन में उपयोग में लाया जा सके इस तरह प्रबोधन लीन चिंतन प्रबल व्यवहारिक ज्ञान पर था।

प्रबोधन की विशेषताएं क्या क्या है?

1.अनुभूति मूलक ज्ञान- इंद्रियों से अनुभव होने वाला ज्ञान
2. ज्ञान को विज्ञान के साथ जोड़ना- प्रयोग एवं परीक्षण पर बोल देना
3. कार्य कारण संबंध का अध्ययन- प्रत्येक घटना के पीछे कोई ना कोई पूर्व घटना
4. मानवतावाद- शक्ति एवं बुद्धिमत्ता का प्रयोग मानव कल्याण के लिए करना
5.देववाद- इस विश्व को किस देवी शक्ति ने बनाया है परंतु संचालन की जिम्मेदारी इंसानों की है
6.समानता एवं स्वतंत्रता पर बल
7.प्रकृति पर बल-प्रकृति का सरल रूप सामाजिक आर्थिक प्रतिबंधों ने भ्रष्ट बनाया

प्रबोधन की सीमाएं

1. प्रबोधन कालीन प्रमुख चिंता मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी थे यह चिंतन बुर्जुआ विश्व दृष्टि को अभिव्यक्ति करता है अतः वे मध्य वर्ग के हितों से परिचालित थे।
2. यह बुद्धिजीवी कानून के साथ-साथ तथा विधि निर्माण पर बल देते थे परंतु विधि निर्माण में मध्यवर्ग का कहीं वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे।
3. इन चिंतकों की दृष्टि कुछ हद तक यूटोपियन प्रतीत होती है क्योंकि यह भविष्य के प्रति अतिरिक्त आशावादी दिखाई देते हैं।
4. प्रबोधन चिंतक ने विज्ञान के संबंध में यह मत व्यक्त किया कि विज्ञान बेहतर दुनिया बना सकता है जिसमें व्यक्ति स्वतंत्रता और खुशी का आनंद उठा सकता है। और विज्ञान का उपयोग को मानव हित में किया जा सकता है।
विज्ञान के प्रति उस विश्वास को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में चुनौती मिली जब विज्ञान और तकनीकी विज्ञान ने हिंसा और समानता को बढ़ावा दिया।

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