भारत इंग्लैंड के द्वारा कैसे गुलाम हुआ?

Bharat gulam kaise hua tha? ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी नेम सन 1757 में बंगाल के नवाब को प्लासी की लड़ाई में हराकर भारतीय उपमहाद्वीप पर
ब्रिटिश साम्राज्य की शुरुआत की थी और उसके बाद किस तरह धीरे-धीरे पूरा भारत उनके अधीन हो गया।
सन 1757 के बाद भारत का औपनिवेशीकरण कई चरणों से गुजरा प्रत्येक चरण का स्वरूप ब्रिटेन की बदलती जरूरत तथा भारतीयों के प्रतिरोध से
निर्धारित हुआ एक और औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत एक संपन्न देश से गरीब देश बना।
दूसरी ओर भारत के लोग अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण कर पाए और उसे
लोकतंत्र समानता की ओर ले जा पाएं हमने भारतीय राष्ट्रवाद लोकतंत्र समानता के लिए संघर्ष की कहानी जान ली।

ब्रिटिश अपने औपनिवेशिक नीतियों और उनके प्रभाव से भारत को कैसे गुलाम बनाया?

1.एकाधिकारी व्यापार का दौर 

शुरुआती दौर में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भारत में दो लक्ष्य थे पहला लक्ष्य था भारत के साथ व्यापार में एकाधिकार स्थापित करना ईस्ट इंडिया कंपनी यह सुनिश्चित करना चाहती थी की वहीं विदेशों में भारतीय माल को बेच सके।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बाजार व हस्तशिल्प के उत्पादन पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए राजनीतिक शक्ति का प्रयोग किया पहले से व्यापार में लगे भारतीय व्यापारियों को या तो व्यापार से ही हटा दिया या फिर ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन व्यापार करने को विवश किया

भारतीय शिल्पियों एवं बुनकरों को अपना मान कम कीमत पर ब्रिटिश कंपनियों को बेचने के लिए विवश किया गया इन सब के कारण भारत का विदेशों से व्यापार तो काफी बड़ा लेकिन बुनकर एवं शिल्पियों को उचित कीमत नहीं मिल

दूसरा लक्ष्य था भारत से प्राप्त राजस्व पर नियंत्रण कर उसे ब्रिटेन के हित में उपयोग करना ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में तथा संपूर्ण एशिया व अफ्रीका में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए युद्ध करना पड़ता था इसके लिए अत्याधिक धन की आवश्यकता होती थी इसे भारत से प्राप्त राजस्व से ही निकालने की कोशिश हुई ज्यादा राजस्व के लिए ज्यादा भूभाग पर नियंत्रण जरूरी था इसके लिए भारत के विभिन्न भागों को जीतकर ब्रिटिश भारत में मिलाने की कोशिश हुई
जो इलाके कंपनी के अधीन हुए वहां पर कंपनी ने नई प्रकार की भू राजस्व व्यवस्था लागू की जिसके तहत जमींदार जमीन के मालिक बने
और जमीन पर निजी स्वामित्व स्थापित हुआ अंग्रेजों की उम्मीद थी कि इससे उन्हें अधिकतम भू राजस्व मिलेगा इसी नीति का दूरगामी असर जहां पड़ा कि
किसानों की स्थिति लगातार बिगड़ती गई और वह अभूतपूर्व मानव निर्मित और अकालों के शिकार होने लगे वह बढ़ते हुए राजस्व को अदा करने के लिए ऋण लेकर साहूकार के चंगुल में फंसते गए

2.इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति और भारत का उपनिवेशीकरण

सन 1750 से 1800 में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति शुरू हो रही थी एकाधिकारी व्यापार व्यवस्था उद्योगपतियों के हितों के अनुकूल नहीं थी वे नहीं
चाहते थे कि भारतीय कपड़े यूरोप में बिके उल्टा वे चाहते थे कि भारत उनके कारखानों में निर्मित कपड़े खरीदें उन्होंने दबाव डाला कि भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण समाप्त हो
धीरे-धीरे ब्रिटेन की संसद ने भारतीय मामलों पर दखल बढ़ाया और ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को सन 1813 में समाप्त कर दिया सन 18 सो 57 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद संसद ने भारत का प्रशासन सीधे अपने हाथों में ले लिया
भारत की व्यापारिक नीतियों में बहुत सारे बदलाव किए ब्रिटेन से आने वाले सामानों पर आयात शुल्क को या तो कम किया गया या फिर समाप्त कर दिया गया ताकि भारत में अंग्रेजी कारखानों में बना सामान बिक सके।
लाखों जुलाहे जो कल तक कपड़ा बनाने के काम में लगे हुए थे बेरोजगार हो गए और कोई काम धंधा नहीं मिलने पर वे सभी खेती करने लगे इससे कृषि
पर आबादी का दबाव बढ़ने लगा उतनी ही जमीन पर अधिक लोग निर्भर हो गए इस प्रक्रिया को भारत का निरूद्योगी करण कहा जाता है इसे हिंदुस्तान गरीब देशों की श्रेणी में आ गया
भारत के गरीब होने के पीछे एक और कारण था विभिन्न तरीकों से अंग्रेजों द्वारा भारत से धन इंग्लैंड भेजा जाना भारतीय राजाओं की खजाने की लूट अंग्रेजी सैनिकों व अफसरों की वेतन आदि के रूप में
भारतीय धन इंग्लैंड भेजा गया यह भुगतान भारत के किसानों के द्वारा चुकाए गए करो से होता था औद्योगिकरण के लिए नील कपास पर्सन जैसे कच्चे माल और अनाज चाय और शक्कर जैसी कृषि उपज की अधिक जरूरत थी
इन्हें सस्ते मैं खरीद कर वे ब्रिटेन भेजना चाहते थे औपनिवेशिक सरकार ने किसानों पर दबाव डाला कि वे इन्हें व्यापारिक फसलों के रूप में उगाए और बेचे जो कि किसानों को लगान चुकाना था वह व्यवस्था व्यापारिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक सिंचाई परियोजनाओं को अंजाम दिया
जिससे खेती के लिए पर्याप्त पानी मिल सके साथ-साथ उसने देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जुड़ने के लिए रेल लाइनें बिछाई भारत में रेलवे के
विकास के लिए अधिकांश समान इंग्लैंड से खरीदा गया इस कारण वहां के लोहान उद्योगों को काफी
फायदा हुआ इस प्रकार भारतीय कृषि को ब्रिटिश उद्योगों की जरूरत अनुसार ढाला गया। नकदी फसल का उत्पादन बढ़ा और कपड़ों की जगह उनका निर्यात में लगा।
 
3.वैचारिक औपनिवेशीकरण
ऊपर हमने देश की अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव को देखा लेकिन उपनिवेशीकरण इससे और आगे लोगों की सोच पर हावी होने का प्रयास करता है या कैसे एक उदाहरण की मदद से समझेंगे।
जब अंग्रेजों ने भारत में अपना स्थान राज्य स्थापित किया तो उनमें से कई लोगों ने भारतीयों की संस्कृति इतिहास आदि को जानने समझने का भरसक प्रयास किया वह भारतीय संस्कृति और धर्म आदि से काफी प्रभावित भी हुए उन्होंने कंपनी सरकार से आग्रह किया
पारंपरिक भारतीय ज्ञान और साहित्य के अध्ययन को संरक्षण देना जरूरी है उनके कहने पर संस्कृत कॉलेज और मदरसे खोले गए इस विचार के लोगों को प्राची वादी कहते हैं प्राची यानी पूर्व अर्थात पर लोग जो पूर्वी संस्कृति से प्रेरित थे।
सन 1800 के बाद कंपनी की कई और अधिकारी हुए जिन्होंने यह माना कि आधुनिक यूरोप का ज्ञान ही जानने योग्य है
अमरिया अंग्रेजी के माध्यम से ही संभव हो सकता है उनका मानना था कि भारतीय परंपरा की ज्ञान किसी काम की नहीं है धन खर्च करना व्यर्थ है उन्हें अलगाववादी अर्थात अंग्रेजी संस्कृत और शिक्षा से प्रेरित लोग कहते हैं
जब अंग्रेजी सरकार की शिक्षा नीति बनी तब अलगाववादी विचार के लोग अधिक प्रभावित रहे इनमें सबसे प्रसिद्ध थे थॉमस मैकाले जिन्होंने सर 1830 में अपनी सिफारिश प्रस्तुत की मैकाले का कहना था
इस बात को सभी मानते हैं कि भारत और अरब के संपूर्ण देसी साहित्य एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक सेल्फ के बराबर ही है।
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